Thursday, December 18, 2008

कभी कभी ,मेरे बावजूद


कभी कभी
मुझसे ही खुद को बचाते हुये
मेरे भीतर से कुछ -
सफ़ेद -नीले धुएं के पेंड़ सा
निकल आता है . . . .

कुछ ऎसा ,
जो बिलकुल
मेरे बावजूद होता है
और
स्वायत्त होता है ! !

(फिर भी),(लोभ वश )

मैं
जलते-बुझते सुनहरे शब्दों की लड़ियां
अपने वृ॒न्तों पर सजाये
उस कल्प-वृ॒क्ष को
(बस)
सहेजता हूं ,
प्रदर्शित करता हूं
अपनी औकात भूल ,
अपने गर्व में जोड़ता हूं , , , ,

और
भरसतः
बने ही रहने देता हूं
अपने इस भरम को
कि रचना यह
मेरी है

किन्तु
वस्तुतः तो
रचता
वही है मुझे .. . . .. .
अपने आविर्भाव में भी . . .
अपने अवगाहन में भी .. . .
अपनी अभिव्यक्ति में भी .. . . ..
कभी कभी , मेरे बावजूद ! !

Tuesday, December 16, 2008

तुम्हारी चुप्पी



तुम्हारी चुप्पी को
अस्वीकार समझ,
अपनी हार समझ,
खुद में वापस लौट गया मैं !

ढलती सांझ -से उदास मन में
पहले उगे तारे- सी
धुधंली, टिमटिमाती इक अन्तिम आस लिये
कि मेरे लौट जाने के बाद
शून्य मन ,कुछ देर तक खड़ें रहोगे तुम ,
उस रिक्त पथ को निहारते ... . .
जिससे लौट गया हूं मैं ! ! !

Monday, December 15, 2008

तुम्हारा चाहना


आकस्मिक मत समझना मेरी उस चुप्पी को
जो तुम्हारी उस निरभ्र, मध्दिम फुसफुसाहट

कि “मैं चाहती हूँ तुम्हें”
पर फैल गयी थी
पूरे मुझ पर !


चुप
या यूँ कहो कि
निरुत्तर ही रहना चाहता था मैं
अपने भीतर की अनजान अधेरी तहों में
इस फुसफुसाहट के ठीक इसी तरह

ख़ुद के लिए ही एक गंभीर प्रश्न
और फिर सहसा एक सरल उत्तर बन जाने तक……..